आज बादल में सुराख़ है |

rain

आज बादल में सुराख़ है |

और क्यों न हो ?
लम्बा सफ़र तय किया है,
इंतज़ार सिर्फ़ उसने नहीं,
मैंने भी किया है
आज नहीं बरसा तो कब बरसेगा |

सुखी मिटटी बहुत छान ली,
आज कीचड़ में सने,
तो शिकायत क्या |
ज़रा भीग गए, तो
शिकायत क्या |

हर गली बनती नदियों में,
इक कागज़ की कश्ती मैं भी उतार दूँ,
जितने आंसू सहेजे थे
बूंदों की आड़ उनको बहा दूँ |
जितनी नमी बाहर है उतनी अंदर भी,
थोड़ा बिगाड़ लून, थोड़ा सवाँर लूँ |

और सावन इतना बुरा भी नहीं,
थोड़ा पागल ज़रूर है |
बिन बोले बरसता है,
जहाँ चाहे बरसता है,
जैसे चाहे बरसता है |

पर भूलना मत,
कभी इसके लिए तुम तरसे थे,
और कोसा था गर्मी को
अब इंतज़ार करोगे सर्द का |

वफ़ा इनसे नहीं तो किस्से करोगे ?

और सावन में बादल को कैसे बोलूँ ?
कि आज न बरसो ||

 

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This entry was published on July 27, 2014 at 14:42. It’s filed under bombay, Gulposh, Hindi poetry, Urdu kavita and tagged , , , , , , , , , . Bookmark the permalink. Follow any comments here with the RSS feed for this post.

2 thoughts on “आज बादल में सुराख़ है |

  1. वाह…

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