Guru Dutt pyaala

मेरे जीवन के प्याले में,
दो बूँद मदिरा के छलका दो |
थके कलाईयाँ साकी की ,
भरे ना प्याला ऐसा हो |
हर घूँट छाँक मैं खो जाऊं
उन यादों के अफसानों में,
और जागूँ तो दरमियाँ मेरे
वही पुराना प्याला हो |

दिन, दोपहर, शाम  हो गयी,
मैं छोड़ू ना उस प्याले को |
तो क्या ? जो साकी आये ,
और कहती मुझसे जाने को |
मैं छोड़ भी दूँ ‘मधुशाला’ को,
और रख प्याला ज़मीन पर;
नशा तो संग चलता मेरे,
मेरे बिस्तर तक, सिरहाने को |

पैमाने का माप है क्या ?
जब पीने वाला घायल हो |
माना, ये हर दर्द का मर्ज़ नहीं,
पर सुकून जो आये, ऐसा हो |
फिर पहुँचूँ मैं दर पे साकी के,
मांगू उससे अपना प्याला;
वह लाये कलश मदिरा भरकर ,
विष मीठा है बहुत चखा
अमृत चखूँ, तो ऐसा हो |

मदहोशी के पर्दों में से
नज़र कोई पद जाए तो,
मस्तिष्क भले तब साथ ना दे,
और दिल-ओ-ज़बान का साझा हो |
अलफ़ाज़ तो मुझको याद नहीं,
नशे का खुमार ऐसा है |
रूठ, साकी चली गयी,
सूना कर, मेरे प्याले  को ||

 

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