मेरी उँगलियों से फिसली न थी
जब तक उसने मांगी न थी,
मेरी कलम |

बेशकीमती ज़रूर थी,
पर उसकी,
ज़रुरत से कम |

स्याही से सनी मेरी उंगलियां उसकी बेदाग़
हाथों को छूने की जुर्रत न कर सकीं,
और शर्म से लिपट गयी
मेरी सफ़ेद कमीज में |

अब उसने कलम बढ़ाया,
तो मेरी झिझक का रंग उसकी उँगलियों पे था |

स्याही के उस दाग ने क्या-क्या न कर दिया ||

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