Photograph- Mukhtar Khan

 

मेरी तलवार पे फबता है रंग लाल,
जब फीका पड़ा, तो अफ़सोस हुआ |

कलमा उनका भी वही था, खुदा भी,
मश्क़-ए-मंतिक़ अलग, तो अफ़सोस हुआ |

कुछ घर जलाये, कुछ उजाड़े,
कुछ बच गए, तो अफ़सोस हुआ |

उनकी सलवार खींची, बाल भी,
आबरू रह गयी, तो अफ़सोस हुआ |

उनके सुनाने पे मेरे सितम पाक लगे,
अपनों ने सुनाये, तो अफ़सोस हुआ ||

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