Photograph: N. Prashant

कि मेरा लिखना है तो बस उगलने के लिए,
कि सुलगती यादों पर टहलने के लिए,
कि मैं टहलता हूँ तो बस गिरने के लिए,
गिर कर उठ कर फिर बढ़ने के लिए |

कि मैं बढ़ता हूँ तो बस परखने के लिए,
कि छेड़ूँ ख़्याल और छिड़ने के लिए,
कि आदमी आमादा है तो बस भिड़ने के लिए,
न सोचने के क़ाबिल न सुलझने के लिए |

कि मैं सुलझता हूँ तो बस उलझने के लिए,
कि मैं उलझता हूँ तो बस समझने के लिए,
कि मैं समझता हूँ तो बस पूछने के लिए
दो सवाल दिल्लगी करने के लिए |

कि मैं आशिक़ हूँ तो इस महफ़िल के लिए
कि मैं शामिल हूँ तो बस सुनने के लिए,
कि मैं सुनता हूँ तो बस कहने के लिए,
अल्फ़ाज़ों में खुद बहने के लिए |

कि मैं बहता हूँ तो बस फिरने के लिए,
कि मैं फिरता हूँ तो बस ढूंढ़ने के लिए,
कि मैं पाता हूँ तो बस खोने के लिए,
खुद पे हंसकर फिर चलने के लिए |

कि मैं चलता हूँ तो बस चलने के लिए,
कि कोई मंज़िल है तो बस मिलने के लिए,
कि मिलना है तो बस तस्सली के लिए,
इस मन में उठती ख़लबली के लिए |

कि ये ख़ालिश है तो बस जीने के लिए,
कि मैं ज़िंदा हूँ तो बस मरने के लिए,
कि मेरा मरना भी बस संवरने के लिए,
ये वक़्त, रक्त, जोबन बदलने के लिए |

कि मैं बदला हूँ तो बस तजुर्बों के लिए,
कि ये लफ्ज़ नहीं बस बुज़ुर्गों के लिए,
कि हाँ, नज़रें उठीं तो बस ताज्जुबों के लिए,
इस हैरत से मिले महबूबों के लिए |

कि मैं भी पागल हूँ तो बस बहानों के लिए,
कि इन बहानो मिलते परवानों के लिए,
कि परवानों से भरे मयखानों के लिए,
कहानियाँ पिलाती साकियों के लिए |

कि साकियाँ हैं तो बस बहलाने के लिए,
कि इरादे-जिस्मानी नफ़सानियों के लिए,
कि ये कमज़ोरियाँ हैं तो बस बताने के लिए,
मैं खुदा नहीं, याद दिलाने के लिए ||

 

 

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