Art: Benjamin Flouw

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?
है पुष्पित जो तेरे नैन-नीर से,
क्या नाम रखोगी उसका ?

केसु में तेरे सजने को आतुर,
पुकारोगी कैसे तुम ?
खुशबू बिन इस यौवन को
सवाँरोगी कैसे तुम ?
हैं कम नहीं फूल यहां
जाने तुम्हें क्या भाता है,
ये ग़ैर स्पर्श भी न चाहे,
कोई लोभी न भोगी उसका |

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?

तुमने देखें हैं कई मधुबन,
देखे हैं कई गुलज़ार बाज़ार |
देखा न होगा तुमने पर,
इस मरुस्थल का इकलौता श्रृंगार |
ये भाग्य अनोखा लाया है,
दुर्लभता में समाया है
बस तुमसे आस लगाया है
अब निर्णय कर दो इसका |

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?

निर्जन बाग़ में जन्मा ये,
इसका होना भी अपवाद है |
ज़रा जुर्रत तो देखो इसकी !!!
पर इसका भी अपना स्वाद है |
रूठा रवि भी लौट आया,
लौट आये पवन और मेघ
बाग़ में बाग़ी कौन है ये,
ज़रा नाम बताओ इसका ?

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?

चंचल सखियाँ जो तेरी हों,
छेड़ें इसको, कभी लाड करें |
और लज्जित हों बाकि पुष्प-कमल
जाके दरिया में डूब मरें |
पर ये तेरा था, तेरा ही है
स्मरण तुम इतना रखना,
वह सखियाँ छेड़ें भी क्या कहके,
जो नाम न होगा इसका |

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?

इस मधुबन में अब है ही क्या ?
ये अकेला ही मर जायेगा;
जो बेनाम, न पूछे कोई इसको,
जो मिले, तो ज़रा खिल जायेगा |
फिर नाम लिए भौरें ढूंढें,
एक सांझी भी ले आएंगे
आबाद करेंगे फिर ‘गुलपोष’,
या बर्बाद जीवन इसका ?

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?

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