गुलाबी चश्में

क्या तुमने उन्हें कहीं देखा ?

तुम क्या ढूंढ रहे हो ?

मेरे गुलाबी चश्में……..

वो तो काफ़ी पुराने हैं ;

हाँ, पर उनमें तुम नयी नज़र आती हो |

ये सफ़ेद बाल नज़र नहीं आते,
ये झुर्रियां नज़र नहीं आती |

पहरेदारियाँ नज़र नहीं आती,
तुम्हारी ख़ामियाँ नज़र नहीं आती |

अलमारी में इतनी साड़ियां नज़र नहीं आती,
थकी तुम्हारी कलाईयाँ नज़र नहीं आती |

आँगन में गाड़ियां नज़र नहीं आती,
कन्धों पे ज़िम्मेदारियाँ नज़र नहीं आती |

झूठी यारियाँ नज़र नहीं आती,
हाथों में लाचारियाँ नज़र नहीं आती |

रिश्तों में बीमारियां नज़र नहीं आती,
बहसों में बारियाँ नज़र नहीं आती |

लेकिन,

ज़ुल्फ़ों में अवारियाँ नज़र आती,
लबों पे ख़ुमारियाँ नज़र आती |

सीने की गहराईयाँ नज़र आती,
शरारती नफ़सानियाँ नज़र आती |

तुम्हारी सिसकियाँ नज़र आती,
पहली किलकारियां भी नज़र आती |

कानों पे लम्बी बालियाँ नज़र आती,
तुम्हारी मीठी गालियाँ नज़र आती |

तुम्हारी नादानियाँ नज़र आती,
उन्हें छिपाती तुम्हारी कहानियाँ नज़र आती……

वो चश्में कहीं मिले तो ज़रा बताना ||

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This entry was published on September 14, 2017 at 01:09. It’s filed under bombay, bombay poetry, Gulposh, Hindi poetry, Kavita, Poetry, Urdu kavita, urdu shayari and tagged , , , , , , , , , , . Bookmark the permalink. Follow any comments here with the RSS feed for this post.

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