खोल भी दो

Photograph: Roopal Jain

काफ़ी देर से खट-खटा रहा हूँ,

मैं नहीं खोलूंगी |

आख़िर क्यों ?

न मैं तुम्हे जानती हूँ, न देख सकती हूँ |

पर आवाज़ तो पहचानती हो….

आवाज़ें बदलती हैं, सूरतें बदलती हैं,

पर सीरतें नहीं बदलती |

हाँ, सीरतें नहीं बदलती; इसलिए |

तो तुमने मेरी आवाज़ से मेरी सीरत परखी ?

काश मुझ में इतनी अक़्ल होती |

ग़लती दोहराना गुनाह है, मौका गवाना भी गुनाह है |

गर मैं तुम्हारी ग़लती हुई तो ?

गर तुम मेरा मौका हुई, तो ?

तुम बहुत ज़िद्दी हो

पर तुम्हारी ज़िद्द से कम |

क्या करूँ, डर लगता है….

आख़िर किस्से ?

अंदर आने वालों से |

मैं अंदर नहीं आना चाहता,

फिर क्यों खट-खटाते हो ?

ताकि तुम्हें बाहर ले चलूँ,
अब खोल भी दो ||

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This entry was published on October 3, 2017 at 01:30. It’s filed under bombay, bombay poetry, Gulposh, Hindi poetry, Kavita, Poetry, Urdu kavita, urdu shayari and tagged , , , , , . Bookmark the permalink. Follow any comments here with the RSS feed for this post.

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