Archives for category: Kavita

परतें चढ़ती रही, परतें उतरती रहीं,
परतें चढ़ती रही, परतें उतरती रहीं ||

जो मैंने खरोंचा तो कहती रही,

तुम्हारे नाखूनों में जो है, वो मैं नहीं,
उन चढ़ती परतों में मैं नहीं
उन उतरती परतों में मैं नहीं
उन परतों के नीचे भी, मैं नहीं |

फिर मैं हूँ कहाँ या हूँ ही नहीं ?

उन परतों से घिसे चीथड़ों में,
तुम्हारी मर्दानगी के थप्पड़ों में
उन आरज़ू भरी लश्करों में
उन नफ़्सानी ज़रूरतों में
आदम के किनारों में
सदोम के गुनहगारों में
मेरी घुटती ख्वाहिशों में
ज़लालत भरी साज़िशों में

मैं थी वहीं, मैं हूँ वहीं
मैं हूँ, यहीं ||

तुम्हारा सवाल काफ़ी मुश्किल है,

पर जवाब आसान है |

कोई और सवाल पूछो |

उसका जवाब भी वही होगा |

ये तुम कैसे जानती हो ?

मैं तुम्हें जानती हूँ ||

Art: Benjamin Flouw

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?
है पुष्पित जो तेरे नैन-नीर से,
क्या नाम रखोगी उसका ?

केसु में तेरे सजने को आतुर,
पुकारोगी कैसे तुम ?
खुशबू बिन इस यौवन को
सवाँरोगी कैसे तुम ?
हैं कम नहीं फूल यहां
जाने तुम्हें क्या भाता है,
ये ग़ैर स्पर्श भी न चाहे,
कोई लोभी न भोगी उसका |

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?

तुमने देखें हैं कई मधुबन,
देखे हैं कई गुलज़ार बाज़ार |
देखा न होगा तुमने पर,
इस मरुस्थल का इकलौता श्रृंगार |
ये भाग्य अनोखा लाया है,
दुर्लभता में समाया है
बस तुमसे आस लगाया है
अब निर्णय कर दो इसका |

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?

निर्जन बाग़ में जन्मा ये,
इसका होना भी अपवाद है |
ज़रा जुर्रत तो देखो इसकी !!!
पर इसका भी अपना स्वाद है |
रूठा रवि भी लौट आया,
लौट आये पवन और मेघ
बाग़ में बाग़ी कौन है ये,
ज़रा नाम बताओ इसका ?

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?

चंचल सखियाँ जो तेरी हों,
छेड़ें इसको, कभी लाड करें |
और लज्जित हों बाकि पुष्प-कमल
जाके दरिया में डूब मरें |
पर ये तेरा था, तेरा ही है
स्मरण तुम इतना रखना,
वह सखियाँ छेड़ें भी क्या कहके,
जो नाम न होगा इसका |

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?

इस मधुबन में अब है ही क्या ?
ये अकेला ही मर जायेगा;
जो बेनाम, न पूछे कोई इसको,
जो मिले, तो ज़रा खिल जायेगा |
फिर नाम लिए भौरें ढूंढें,
एक सांझी भी ले आएंगे
आबाद करेंगे फिर ‘गुलपोष’,
या बर्बाद जीवन इसका ?

मृत मधुबन में गर फूल खिले,
क्या नाम रखोगी उसका ?

बस पाँच मोड़, और हो गया तैयार
मैं सिकंदर और यह मेरा जहाज़,
फिर हर गली मेरी सल्तनत |

पगडंडी संग बहती धाराओं में वह जहाँ-जहाँ बहता, मैं उसके संग दौड़ता हुआ मन ही मन हर वह किला फ़तेह करता | अक्सर चौराहों पर मुझे और जहाज़ मिलते और उनके साथ मिलते उनके सिकंदर, उनके सिंदबाद, उनके इब्न (Ibn ), नेपोलियन और कोलम्बस | फिर साझा होता, जहाज़ें परखी जाती, जहाज़ें देखने-दिखाने में जंग रह जाती और सब अपनी राहें बह जाते |

दूसरे चौराहे तक लहरों में उलझ मेरा जहाज़ कहीं आगे निकल गया | यहां फ़तेह करने को न किले थे, न बाकी जहाज़ों के सिल-सिले थे; न सिंदबाद था न इब्न था, अब शायद मैं भी सिकंदर न था |
मैं ढूंढना भूल चूका था, मैं खोजना भूल चूका था, पिछले चौराहे से इस चौराहे तक ज़रा संतुष्ट सा हो चूका था |

गर मैं सिकंदर हूँ तो मेरी तबियत के लिए ये हरगिज़ ठीक नहीं |

मैं अपना खोया जहाज़ ढूंढ़ने के लिए अगले चौराहे तक गया | जहाज़ तो नहीं था, कुछ छोटी कश्तियाँ थी |
सिंदबाद, इब्न और कोलम्बस अभी भी मेरी नज़र में नहीं थे | खेवय्यों ने भी मेरा जहाज़ नहीं देखा था |
आख़िर इन छोटी कश्तियों में ऐसा क्या था जो लहरों ने इन्हें नहीं बिखेरा ?
समन्दर तो काफ़ी बड़ा है, क्या-क्या नहीं निगल सकता फिर चाहे जहाज़ सिकंदर का ही क्यों न हो ?
और मतलब तो मुझे समन्दर लांघने से है |

अब मैं कश्ती पर सवार हूँ, किले फ़तेह नहीं पर उन्हें सलाम ज़रूर करता हूँ | मैं अब बूढ़ा हूँ, कमज़ोर हूँ, थका हुआ हूँ पर बह रहा हूँ, जहाज़ ढूंढ रहा हूँ | हालाँकि मैं नहीं चाहता कि मेरा जहाज़ या सिंदबाद और बाकी मुझे दोबारा नज़र आये | मिल गए तो इस गोले का सफर मुकम्मल हो जायेगा, थमने का बहाना मिल जायेगा |

और मैं सिकंदर हूँ, अपनी किस्मत से नहीं अपनी फ़ितरत से ज़िंदा हूँ ||

Photograph: Oshi Alika Narayan

तुम्हारे यूँ लौटने का मैं क्या मतलब समझूँ  ?

जो इंतज़ार मैंने इस दरमियाँ किया है
जो अश्क़ मैंने बहाएं हैं
जो दुआएं मैंने कभी मांगी थी
जो धागे मज़ारों पर बाँधी थी
जो हुस्न मैंने खोया है
जो ज़ख्म मैंने पाया है
जो दर्द मेरा…. गोया है
क्या तुम्हारे लौटने की वजह ?

या मैं यूँ समझूँ,

कि किसी और ने तुम्हें चाहा नहीं
कि तुम काबिल-ए-वफ़ा नहीं
कि शर्तें तुम्हारी चली नहीं
कि परतें तुम्हारी खुली नहीं
कि राहें सही मिली नहीं
कि फ़ालें तुम्हें जचि नहीं
क्या टूटा दिल तुम्हारा नहीं ?
क्या फूटा आंसू तुम्हारा नहीं ?

ये चश्म-पुरआब तुम्हारी एक ज़िंदा झलक को इस्बात थी,
तुम्हें अब देखना इन्हें ना-गवार है  ||

Photograph- Mukhtar Khan

 

मेरी तलवार पे फबता है रंग लाल,
जब फीका पड़ा, तो अफ़सोस हुआ |

कलमा उनका भी वही था, खुदा भी,
मश्क़-ए-मंतिक़ अलग, तो अफ़सोस हुआ |

कुछ घर जलाये, कुछ उजाड़े,
कुछ बच गए, तो अफ़सोस हुआ |

उनकी सलवार खींची, बाल भी,
आबरू रह गयी, तो अफ़सोस हुआ |

उनके सुनाने पे मेरे सितम पाक लगे,
अपनों ने सुनाये, तो अफ़सोस हुआ ||

मेरी उँगलियों से फिसली न थी
जब तक उसने मांगी न थी,
मेरी कलम |

बेशकीमती ज़रूर थी,
पर उसकी,
ज़रुरत से कम |

स्याही से सनी मेरी उंगलियां उसकी बेदाग़
हाथों को छूने की जुर्रत न कर सकीं,
और शर्म से लिपट गयी
मेरी सफ़ेद कमीज में |

अब उसने कलम बढ़ाया,
तो मेरी झिझक का रंग उसकी उँगलियों पे था |

स्याही के उस दाग ने क्या-क्या न कर दिया ||

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मेरी खिड़की से जो पुल दिखता है
उसपे रौशनी टिमटिमाती है
जुगनू की तरह |
एक पल दिखती है एक पल नहीं,
पर इतना यकीन है कि उसमें जान है |

जान पुल के इस पार भी है और उस पार भी,
पर उसे देखने वाले में नहीं |

मैं उससे कोसों दूर हूँ,
अपनी खामियों में मशरूफ़,
अपनी कसमकश में महफूज़ |

वो पुल
बस तसल्ली दे जाता है,
कि मेरा अँधेरा कमरा
उससे ही रोशन है ||

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जब अंग लगा उस कोहनी से,
तो हलक-हल्का दर्द हुआ
उस दर्द का शॉट तो मैं पी गया,
वरना काहे का मर्द हुआ |

बड़े प्यार से उसने बोला,
भाऊ, दादर उत्रायच का?

“भाई दादर आने में तो एक पुश्त का फर्क है,
बस सीधे खड़े रहो, तौबा तेरा twerk है” |

अब twerk पे तो सैकड़ों का ईमान डोला है,
फिर इसका गुरूर क्यों नहीं?
आख़िर ego भी तो कोई चीज़ होती है |

फिर कोहनी थोड़ी और लगी,
फिर लात लगी फिर हाथ,
ज़बान फिसली आदर to मादर,
दर्द-ऐ-दादर हुए हालात |

अब बन्दा चाहे मान भी जाए,
जनता को बड़ी चूल है |
जब तक वह दो हाथ न लगाए,
वो क्या घण्टा कूल है ?

अब self-defence में मैंने भी गरबा-डांडिया खेल लिया,
साला जो मिला, उसी को पेल दिया |

मेरे मुक्के के भोगी ने,
धर के मेरा कालर, bola
“तू जानता नहीं, कौन है मेरा father ?
Bro, it’s not Delhi it’s दर्द-ऐ-दादर ||

Mandarin-orange-in-peel2

सिरे से पकड़कर नोच डाली उसकी खाल
और छीटें उड़ी,
मुँह में स्वाद तो नहीं
पर आखों में दर्द ज़रूर था |

अब मैं संतरा काट के खाता हूँ ||