साल का ये आखिरी हफ्ता बड़ा असमंजस भरा होता है,  बिलकुल Jab we met  की ‘गीत’ की तरह जिसे climax तक ये समझ नहीं आता कि उसे ज़िन्दगी में आखिर चाहिए क्या, अंशुमन या आदित्य ?

इस हफ्ते में कई ज़रूरी मुद्दों पे फैसले लिया जाते  हैं, जैसे कि :
i) नया कैलेंडर कौन सा खरीदें? (Pirelli या Kingfisher)
ii) किसे पटाएं और किसे छोड़ें?
iii) एक वर्षीय योजनाएं (जिन पे अमल का कमल कभी खिलता ही नहीं, और ये पंच वर्षीय योजनाओं में तब्दील हो जाती हैं)
iv) Unrealistically Random Goals. (संक्षिप्त परिभाषा के लिए लेखक से सीधे संपर्क करें)

खैर, आप इनमें से जो भी चुने, एक चीज़ तो होना लाज़मी है, और वह है #flashback | गुज़रे साल कि हर छोटी बड़ी चीज़, चाहे आपका चोरी का गमला हो या नीलाम हुआ बंगला; सब के सब कम्बख़्त इसी दौरान दिमाग के चक्कर काटने लगते हैं | मुश्किल तो तब खड़ी होती है जब ये सारे ख़याल आपके EPIC New Year Plan पे बेहिसाब मूतने लगते हैं |

मेरा इरादा आपकी मुरादों पे मूतना कतई नहीं है; मैं फितरत से ‘शायर’ हूँ और औकात से ‘Content Writer’ और आदत से मजबूर | लेकिन ये बात भी सही है कि महज़ साल नया है, आपके रिश्तेदार वही हैं, दोस्त उतने ही हरामी और औकात वही पुरानी | इसलिए अपनी नन्ही सी जान पे ज़्यादा वज़न मत पालो और न ही फ़िज़ूल के स्य्यापे |

और हाँ,  #हैप्पीन्यूइयर२०१७ ||

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जब अंग लगा उस कोहनी से,
तो हलक-हल्का दर्द हुआ
उस दर्द का शॉट तो मैं पी गया,
वरना काहे का मर्द हुआ |

बड़े प्यार से उसने बोला,
भाऊ, दादर उत्रायच का?

“भाई दादर आने में तो एक पुश्त का फर्क है,
बस सीधे खड़े रहो, तौबा तेरा twerk है” |

अब twerk पे तो सैकड़ों का ईमान डोला है,
फिर इसका गुरूर क्यों नहीं?
आख़िर ego भी तो कोई चीज़ होती है |

फिर कोहनी थोड़ी और लगी,
फिर लात लगी फिर हाथ,
ज़बान फिसली आदर to मादर,
दर्द-ऐ-दादर हुए हालात |

अब बन्दा चाहे मान भी जाए,
जनता को बड़ी चूल है |
जब तक वह दो हाथ न लगाए,
वो क्या घण्टा कूल है ?

अब self-defence में मैंने भी गरबा-डांडिया खेल लिया,
साला जो मिला, उसी को पेल दिया |

मेरे मुक्के के भोगी ने,
धर के मेरा कालर, bola
“तू जानता नहीं, कौन है मेरा father ?
Bro, it’s not Delhi it’s दर्द-ऐ-दादर ||

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उस पाक़ निशा कि बात वही,
जो चुरा सूर्य से रौशनी
कर दे रोशन उस चाँद को;
है ख़बर खुदा को पर ख़ैर नहीं |

है ख़बर उन सारे तारों को,
कि ये राज़ मिसाल-ए-मोती बिखेर दे,
बस डर इतना, कहीं
गर्दिश में खुदा न फेर दे |

क्योंकि,
उस पाक़ निशा कि बात यही ||

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सिरे से पकड़कर नोच डाली उसकी खाल
और छीटें उड़ी,
मुँह में स्वाद तो नहीं
पर आखों में दर्द ज़रूर था |

अब मैं संतरा काट के खाता हूँ ||

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वो कुछ कह रही थी,
मैं कुछ सुन रहा था |

वो थोड़ा और कहने लगी,
मैं थोड़ा और सुनने लगा |

वो बहुत कुछ कहने लगी,
मैं सब कुछ सुनने लगा |

मेरे शब्दों से पहले उसका घर आ गया

आज, टैक्सी बाज़ी मार ले गयी ||

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न फ़िज़ाओं में न तरानों में,
न महफ़िलों में न वीरानों में,
न हकीकत में न ख्यालों में,
न जानो में न अंजानों में,
न वफाओं में न जफ़ाओं में |

और तो और,
न सजदों में न बद्दुआओं  में,

है लापता मेरा सुकून,
अब मिलने की गुँजाइश कहाँ………||

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Art: Old man and the sea.

समन्दर की उफानी लहरों को देख कर,
मेरे अंदर का सैलाब शांत हो जाता है |
इसलिए नहीं की उसमें दर्द ज़्यादा है,
बल्कि तसल्ली मिल जाती है,
कि कमसकम, मैं अकेला नहीं हूँ |

और ये ख्याल कुछ नया नहीं है |

जब किसी और की कशमकश तुमसे इत्तेफ़ाक़ रखे,
तो सुकून आना तो लाज़मी है ||

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मुझे लगा की तुम चली गयी,

गयी तो थी |

फिर यहाँ कैसे?

सारे रास्ते तुम तक जो थे |

तुम्हारा रास्ता ग़लत होगा !!

हो सकता है, पर शायद तुम सही थे ||

moonshoon

 

Chaandni ne chhua hai mujhe,
Hadd se bhi zyaada aajkal.

Mehfuz raha ambar tal`e,
Sirf sukoon aajkal.

Aur chaandni kahe,
Tera chaain kahin aur.
Uspe ghana yeh sitaron ka shor.
Unko bhi chhua aajkal.

Jo roshni aaye jharokhe se,
Chup ke se, sharma ke.
Aur ujjla Chaand bhi
Woh dekhe kahin se.
Phir kyun karoon main shiqayat
Ki woh paas nahi.
Faaslon mein bhi hai
Woh pass kahin.
Jugnu  hi the meri gawahi, Kab?
Aajkal……..aajkal.

Chaandni ne chhua hai mujhe,
Hadd se bhi zyada aajkal.

Ab har chadhti chaandni mein,
Aaye woh nazar.
Aur sitare karein shaitaniyaan.
Jalte-bujhte tim-timate,
Jaise yaadon ki sargoshiyaan.

Aur main kya kahoon unse?
Jo kaha na ab tak.
Bol, uss unkahe bandhan ke.

Phir mujh par muskurana chaandni ka.
Ki main kya kahoon, kaise kahoon?
Ya chup rahoon.
Aur wahi pahuchaye bol mere.
Jo choo rahi hum dono ko,
Kuchh zyada hi aajkal.

Guru Dutt pyaala

मेरे जीवन के प्याले में,
दो बूँद मदिरा के छलका दो |
थके कलाईयाँ साकी की ,
भरे ना प्याला ऐसा हो |
हर घूँट छाँक मैं खो जाऊं
उन यादों के अफसानों में,
और जागूँ तो दरमियाँ मेरे
वही पुराना प्याला हो |

दिन, दोपहर, शाम  हो गयी,
मैं छोड़ू ना उस प्याले को |
तो क्या ? जो साकी आये ,
और कहती मुझसे जाने को |
मैं छोड़ भी दूँ ‘मधुशाला’ को,
और रख प्याला ज़मीन पर;
नशा तो संग चलता मेरे,
मेरे बिस्तर तक, सिरहाने को |

पैमाने का माप है क्या ?
जब पीने वाला घायल हो |
माना, ये हर दर्द का मर्ज़ नहीं,
पर सुकून जो आये, ऐसा हो |
फिर पहुँचूँ मैं दर पे साकी के,
मांगू उससे अपना प्याला;
वह लाये कलश मदिरा भरकर ,
विष मीठा है बहुत चखा
अमृत चखूँ, तो ऐसा हो |

मदहोशी के पर्दों में से
नज़र कोई पद जाए तो,
मस्तिष्क भले तब साथ ना दे,
और दिल-ओ-ज़बान का साझा हो |
अलफ़ाज़ तो मुझको याद नहीं,
नशे का खुमार ऐसा है |
रूठ, साकी चली गयी,
सूना कर, मेरे प्याले  को ||