Mandarin-orange-in-peel2

सिरे से पकड़कर नोच डाली उसकी खाल
और छीटें उड़ी,
मुँह में स्वाद तो नहीं
पर आखों में दर्द ज़रूर था |

अब मैं संतरा काट के खाता हूँ ||

Bombay taxi art

वो कुछ कह रही थी,
मैं कुछ सुन रहा था |

वो थोड़ा और कहने लगी,
मैं थोड़ा और सुनने लगा |

वो बहुत कुछ कहने लगी,
मैं सब कुछ सुनने लगा |

मेरे शब्दों से पहले उसका घर आ गया

आज, टैक्सी बाज़ी मार ले गयी ||

Laapata image

न फ़िज़ाओं में न तरानों में,
न महफ़िलों में न वीरानों में,
न हकीकत में न ख्यालों में,
न जानो में न अंजानों में,
न वफाओं में न जफ़ाओं में |

और तो और,
न सजदों में न बद्दुआओं  में,

है लापता मेरा सुकून,
अब मिलने की गुँजाइश कहाँ………||

Old-man-and-the-sea.preview

Art: Old man and the sea.

समन्दर की उफानी लहरों को देख कर,
मेरे अंदर का सैलाब शांत हो जाता है |
इसलिए नहीं की उसमें दर्द ज़्यादा है,
बल्कि तसल्ली मिल जाती है,
कि कमसकम, मैं अकेला नहीं हूँ |

और ये ख्याल कुछ नया नहीं है |

जब किसी और की कशमकश तुमसे इत्तेफ़ाक़ रखे,
तो सुकून आना तो लाज़मी है ||

IMG_20150712_164238~2

मुझे लगा की तुम चली गयी,

गयी तो थी |

फिर यहाँ कैसे?

सारे रास्ते तुम तक जो थे |

तुम्हारा रास्ता ग़लत होगा !!

हो सकता है, पर शायद तुम सही थे ||

moonshoon

 

Chaandni ne chhua hai mujhe,
Hadd se bhi zyaada aajkal.

Mehfuz raha ambar tal`e,
Sirf sukoon aajkal.

Aur chaandni kahe,
Tera chaain kahin aur.
Uspe ghana yeh sitaron ka shor.
Unko bhi chhua aajkal.

Jo roshni aaye jharokhe se,
Chup ke se, sharma ke.
Aur ujjla Chaand bhi
Woh dekhe kahin se.
Phir kyun karoon main shiqayat
Ki woh paas nahi.
Faaslon mein bhi hai
Woh pass kahin.
Jugnu  hi the meri gawahi, Kab?
Aajkal……..aajkal.

Chaandni ne chhua hai mujhe,
Hadd se bhi zyada aajkal.

Ab har chadhti chaandni mein,
Aaye woh nazar.
Aur sitare karein shaitaniyaan.
Jalte-bujhte tim-timate,
Jaise yaadon ki sargoshiyaan.

Aur main kya kahoon unse?
Jo kaha na ab tak.
Bol, uss unkahe bandhan ke.

Phir mujh par muskurana chaandni ka.
Ki main kya kahoon, kaise kahoon?
Ya chup rahoon.
Aur wahi pahuchaye bol mere.
Jo choo rahi hum dono ko,
Kuchh zyada hi aajkal.

Guru Dutt pyaala

मेरे जीवन के प्याले में,
दो बूँद मदिरा के छलका दो |
थके कलाईयाँ साकी की ,
भरे ना प्याला ऐसा हो |
हर घूँट छाँक मैं खो जाऊं
उन यादों के अफसानों में,
और जागूँ तो दरमियाँ मेरे
वही पुराना प्याला हो |

दिन, दोपहर, शाम  हो गयी,
मैं छोड़ू ना उस प्याले को |
तो क्या ? जो साकी आये ,
और कहती मुझसे जाने को |
मैं छोड़ भी दूँ ‘मधुशाला’ को,
और रख प्याला ज़मीन पर;
नशा तो संग चलता मेरे,
मेरे बिस्तर तक, सिरहाने को |

पैमाने का माप है क्या ?
जब पीने वाला घायल हो |
माना, ये हर दर्द का मर्ज़ नहीं,
पर सुकून जो आये, ऐसा हो |
फिर पहुँचूँ मैं दर पे साकी के,
मांगू उससे अपना प्याला;
वह लाये कलश मदिरा भरकर ,
विष मीठा है बहुत चखा
अमृत चखूँ, तो ऐसा हो |

मदहोशी के पर्दों में से
नज़र कोई पद जाए तो,
मस्तिष्क भले तब साथ ना दे,
और दिल-ओ-ज़बान का साझा हो |
अलफ़ाज़ तो मुझको याद नहीं,
नशे का खुमार ऐसा है |
रूठ, साकी चली गयी,
सूना कर, मेरे प्याले  को ||

 

lifeline

Kuchh rekhaon ka aaroh-avroh hi tha,
Jisne use sthir rakha tha.
Shyya par leti woh thi,
Chanchal main tha.
Mere sparsh ki garmahat na use mili,
Na mere shabdon ka koi vidroh tha.
Uske shesh astitva ka eklauta praman
Bas wahi……….
Kuchh rekhaon ka aaroh-avroh.

Ashru aur lochan ka ghamasan adig.
Ya tu jhapak ya to tapak.
Ab haar kaun mane?
Jhapak liya toh kho diya,
Tapka, to bhi kho diya.
Isliye dhairya bandhe dekh raha tha,
Kuchh rekhaon ko aaroh-avroh.

Mere paanjar ki chand rekhaon mein,
Tumhara bhi naam likha hai.
Likha hai jeevan-mrityu ka sang.
Kya, iska jhootlana bhi likha hai?
Ab inse aas kya lagau,
Na Kalma padhu na, na bhog chadhau.
Aas hai to toh,
Kuchh rekhaon ka aaroh-avroh.

Ungli kheenchi toh, yaad aaya.
Tumhara ek ansh to abhi bhi baki hai mere paas.
Parinay sood humara usmein,
Mera lahu aur saya tumhara  usmein.
Tum aaj hi tar jao is lok se
Aur rakhna humein apne aanchal tale.
Nashvar ang se chir Aks bada.
Toh, ab kyun dekhun??
Kuchh rekhaon ka aaroh-avroh.

Sahsa meri ungli par kheechav badha.
Woh chad gayi us shyya pe.
Dekha maine putri-janani ka divya milan.
Ab rekhaein sthir,
Aur Spandan sparsh: Viram.

rain

आज बादल में सुराख़ है |

और क्यों न हो ?
लम्बा सफ़र तय किया है,
इंतज़ार सिर्फ़ उसने नहीं,
मैंने भी किया है
आज नहीं बरसा तो कब बरसेगा |

सुखी मिटटी बहुत छान ली,
आज कीचड़ में सने,
तो शिकायत क्या |
ज़रा भीग गए, तो
शिकायत क्या |

हर गली बनती नदियों में,
इक कागज़ की कश्ती मैं भी उतार दूँ,
जितने आंसू सहेजे थे
बूंदों की आड़ उनको बहा दूँ |
जितनी नमी बाहर है उतनी अंदर भी,
थोड़ा बिगाड़ लून, थोड़ा सवाँर लूँ |

और सावन इतना बुरा भी नहीं,
थोड़ा पागल ज़रूर है |
बिन बोले बरसता है,
जहाँ चाहे बरसता है,
जैसे चाहे बरसता है |

पर भूलना मत,
कभी इसके लिए तुम तरसे थे,
और कोसा था गर्मी को
अब इंतज़ार करोगे सर्द का |

वफ़ा इनसे नहीं तो किस्से करोगे ?

और सावन में बादल को कैसे बोलूँ ?
कि आज न बरसो ||

 

Shyam pranjal, raat chanchal.
Diwani hoti hai fiza.
Deep jalau aur saheju,
Jab tak na dekhu Mehrunissa.

Gina kar ambar ke taare saare,
Meghon ke saaye mein aake,
Aaj jahan wo tehre hain
Wahin hogi kal Mehrunissa.

Thoda intezaar hai ab bhi baaki,
Tan khilafi, palkein baagi.
Bhor ka sehra uthe,
To dekhun main Mehrunissa.