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मेरी खिड़की से जो पुल दिखता है
उसपे रौशनी टिमटिमाती है
जुगनू की तरह |
एक पल दिखती है एक पल नहीं,
पर इतना यकीन है कि उसमें जान है |

जान पुल के इस पार भी है और उस पार भी,
पर उसे देखने वाले में नहीं |

मैं उससे कोसों दूर हूँ,
अपनी खामियों में मशरूफ़,
अपनी कसमकश में महफूज़ |

वो पुल
बस तसल्ली दे जाता है,
कि मेरा अँधेरा कमरा
उससे ही रोशन है ||