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bwsl

मेरी खिड़की से जो पुल दिखता है
उसपे रौशनी टिमटिमाती है
जुगनू की तरह |
एक पल दिखती है एक पल नहीं,
पर इतना यकीन है कि उसमें जान है |

जान पुल के इस पार भी है और उस पार भी,
पर उसे देखने वाले में नहीं |

मैं उससे कोसों दूर हूँ,
अपनी खामियों में मशरूफ़,
अपनी कसमकश में महफूज़ |

वो पुल
बस तसल्ली दे जाता है,
कि मेरा अँधेरा कमरा
उससे ही रोशन है ||

we-love-mumbai-local

जब अंग लगा उस कोहनी से,
तो हलक-हल्का दर्द हुआ
उस दर्द का शॉट तो मैं पी गया,
वरना काहे का मर्द हुआ |

बड़े प्यार से उसने बोला,
भाऊ, दादर उत्रायच का?

“भाई दादर आने में तो एक पुश्त का फर्क है,
बस सीधे खड़े रहो, तौबा तेरा twerk है” |

अब twerk पे तो सैकड़ों का ईमान डोला है,
फिर इसका गुरूर क्यों नहीं?
आख़िर ego भी तो कोई चीज़ होती है |

फिर कोहनी थोड़ी और लगी,
फिर लात लगी फिर हाथ,
ज़बान फिसली आदर to मादर,
दर्द-ऐ-दादर हुए हालात |

अब बन्दा चाहे मान भी जाए,
जनता को बड़ी चूल है |
जब तक वह दो हाथ न लगाए,
वो क्या घण्टा कूल है ?

अब self-defence में मैंने भी गरबा-डांडिया खेल लिया,
साला जो मिला, उसी को पेल दिया |

मेरे मुक्के के भोगी ने,
धर के मेरा कालर, bola
“तू जानता नहीं, कौन है मेरा father ?
Bro, it’s not Delhi it’s दर्द-ऐ-दादर ||

Bombay taxi art

वो कुछ कह रही थी,
मैं कुछ सुन रहा था |

वो थोड़ा और कहने लगी,
मैं थोड़ा और सुनने लगा |

वो बहुत कुछ कहने लगी,
मैं सब कुछ सुनने लगा |

मेरे शब्दों से पहले उसका घर आ गया

आज, टैक्सी बाज़ी मार ले गयी ||