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बस पाँच मोड़, और हो गया तैयार
मैं सिकंदर और यह मेरा जहाज़,
फिर हर गली मेरी सल्तनत |

पगडंडी संग बहती धाराओं में वह जहाँ-जहाँ बहता, मैं उसके संग दौड़ता हुआ मन ही मन हर वह किला फ़तेह करता | अक्सर चौराहों पर मुझे और जहाज़ मिलते और उनके साथ मिलते उनके सिकंदर, उनके सिंदबाद, उनके इब्न (Ibn ), नेपोलियन और कोलम्बस | फिर साझा होता, जहाज़ें परखी जाती, जहाज़ें देखने-दिखाने में जंग रह जाती और सब अपनी राहें बह जाते |

दूसरे चौराहे तक लहरों में उलझ मेरा जहाज़ कहीं आगे निकल गया | यहां फ़तेह करने को न किले थे, न बाकी जहाज़ों के सिल-सिले थे; न सिंदबाद था न इब्न था, अब शायद मैं भी सिकंदर न था |
मैं ढूंढना भूल चूका था, मैं खोजना भूल चूका था, पिछले चौराहे से इस चौराहे तक ज़रा संतुष्ट सा हो चूका था |

गर मैं सिकंदर हूँ तो मेरी तबियत के लिए ये हरगिज़ ठीक नहीं |

मैं अपना खोया जहाज़ ढूंढ़ने के लिए अगले चौराहे तक गया | जहाज़ तो नहीं था, कुछ छोटी कश्तियाँ थी |
सिंदबाद, इब्न और कोलम्बस अभी भी मेरी नज़र में नहीं थे | खेवय्यों ने भी मेरा जहाज़ नहीं देखा था |
आख़िर इन छोटी कश्तियों में ऐसा क्या था जो लहरों ने इन्हें नहीं बिखेरा ?
समन्दर तो काफ़ी बड़ा है, क्या-क्या नहीं निगल सकता फिर चाहे जहाज़ सिकंदर का ही क्यों न हो ?
और मतलब तो मुझे समन्दर लांघने से है |

अब मैं कश्ती पर सवार हूँ, किले फ़तेह नहीं पर उन्हें सलाम ज़रूर करता हूँ | मैं अब बूढ़ा हूँ, कमज़ोर हूँ, थका हुआ हूँ पर बह रहा हूँ, जहाज़ ढूंढ रहा हूँ | हालाँकि मैं नहीं चाहता कि मेरा जहाज़ या सिंदबाद और बाकी मुझे दोबारा नज़र आये | मिल गए तो इस गोले का सफर मुकम्मल हो जायेगा, थमने का बहाना मिल जायेगा |

और मैं सिकंदर हूँ, अपनी किस्मत से नहीं अपनी फ़ितरत से ज़िंदा हूँ ||

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मेरी खिड़की से जो पुल दिखता है
उसपे रौशनी टिमटिमाती है
जुगनू की तरह |
एक पल दिखती है एक पल नहीं,
पर इतना यकीन है कि उसमें जान है |

जान पुल के इस पार भी है और उस पार भी,
पर उसे देखने वाले में नहीं |

मैं उससे कोसों दूर हूँ,
अपनी खामियों में मशरूफ़,
अपनी कसमकश में महफूज़ |

वो पुल
बस तसल्ली दे जाता है,
कि मेरा अँधेरा कमरा
उससे ही रोशन है ||

Old-man-and-the-sea.preview

Art: Old man and the sea.

समन्दर की उफानी लहरों को देख कर,
मेरे अंदर का सैलाब शांत हो जाता है |
इसलिए नहीं की उसमें दर्द ज़्यादा है,
बल्कि तसल्ली मिल जाती है,
कि कमसकम, मैं अकेला नहीं हूँ |

और ये ख्याल कुछ नया नहीं है |

जब किसी और की कशमकश तुमसे इत्तेफ़ाक़ रखे,
तो सुकून आना तो लाज़मी है ||